पापाजी एक कुरसी लाए,
जिसमें लगे थे चार पाए।
उस पर थी एक सुन्दर गद्दी,
जो हमको लगती थी भद्दी।
जब हम कुरसी पर जाते बैठ,
तब मम्मी देती कान उमेठ।
कुरसी थी मेहमान के लिए,
चाय-नाश्ता जलपान के लिए।
थी पड़ोसन एक आंटी न्यारी,
कुरसी उनको थी बड़ी प्यारी।
लेकिन गड़बड़ बात थी एक,
कुंतल भर था उनका वेट।
एक बार आंटी मेरे घर आईं,
उनको कुरसी बेहद भाई।
कुरसी पर बैठने का इरादा जताया,
मेरी मम्मी का मन सकपकाया।
क्यों कि कुरसी जाती टूट,
मेरे पापा जाते रूठ।
डरते हुए बैठने का इशारा किया,
आंटी ने कुरसी का सहारा लिया।
अचानक मेरी कुरसी टूटी,
आंटी जी की किस्मत फूटी।
रात को मेरे पापा आए,
टूटी कुरसी देख गुर्राए।
कान पकड़ कर कसम खाई,
कभी न कुरसी लाऊंगा भाई।












