मुझे गली में उतारकर रिक्शेवाला चला गया। ये गली और संकरी थी। इसमें रिक्शा नहीं जा सकता था। पैदल ही मैं बढ़ा। एक लड़का जो नाली पर शौच के लिए बैठा था उठकर भागा। सड़क के किनारे बनी नालियों को ढंकने के लिए जो चौकोर पत्थर के टुकड़े लगाए गए थे उनको थोड़ा सा इधर उधर कर उनके बीच फाँक बना दी गयी थी। उसी पर बैठकर वह लड़का शौच कर रहा था।
जाड़े की सुबह थी। अभी सात बजे थे काफी कुहरा था। सौ मीटर की दूरी पर स्थित मकान दिखाई नहीं देते थे। वह लड़का भागकर एक खम्भे के पीछे खड़ा होकर मुझे देखने लगा। ठंड से कांप रहा था। मैंने ठंड से बचने का काफी प्रबन्ध कर लिया था। एक हाफ स्वेटर फूल स्वेटर, एक कोट, टाई भी पहने था। एक इनर उसके ऊपर सूट। कान बाँधने के लिए कीमती मफलर। बूट भी काफी कीमती था। शायद मेरे बूट की आवाज से उस लड़के को किसी जानवर का आभास हुआ होगा। इसीलिए वह भागा था। ज्योंही मैं आगे बढ़ा वह फिर अपने उसी पाखाने पर जाकर जम गया। नालियों से मल बह रहा था। आगे बढ़कर एक महिला से मैंने अपने फूफा का मकान पूछा।
मैं आगे बढ़ा। सूअरों का एक झुण्ड मेरे आगे से दौड़ते हुए निकला। उनकी ‘चीं-कें’ की इत्यादि विचित्र आवाजें बड़ी विचित्र लगीं। लगा कि कैसी विचित्र जगह पर आ गया हूँ। एकदम कबाड़ खाना है।
सामने दो सूअर सम्भोग का असफल प्रयास कर रहे थे, भागे। मेरा मन एकदम घृणा से भर गया। मन में आया कि उल्टे पाँव लौट जाऊँ। पर फिर सोचा कि फूआ से बिना मिले नहीं जाऊँगा। जब इतनी दूर आ गया तो कुछ दूर किसी भी तरह चलूँगा। पर आगे बढ़ने पर एक भयंकर दुर्गन्ध नाक से टकराई अब आगे बढ़ना मुझे मूर्खता पूर्ण लग रहा था। फिर मस्तिष्क में आया कि उस औरत के बताए अनुसार बस अब थोड़ी दूर और चलना था। लगभग बीस या पच्चीस कदम और। मैंने तुरंत एक सुगन्धित रुमाल निकाला। और बड़ी शान से उसे नाक पर रख कर चलने लगा और यह दिखाने का पूरा प्रयत्न करने लगा कि मैं एक माडर्न व्यक्ति हूँ और इस कालोनी के लोग एकदम जानवर हैं जो इस गन्दे वातावरण में रहते हैं। मैं बार-बार इधर-उधर नाक पर रुमाल रखे देख रहा था। उद्देश्य था लोगों को दिखाना था कि मैं कितना स्वच्छ हूँ। फिर चश्मा निकाला उसे पहन लिया। फिर रुमाल से पूरा चेहरा पोंछा जैसे कि इस गन्दे वातावरण में मेरा मुँह काला हो गया हो।
आखिर में चलते-चलते एक दरवाजे के सामने जाकर मैं रुक गया। उस औरत के बताने के अनुसार यही घर मालूम पड़ता था। थोड़ी देर तक यूँ ही खड़ा उस घर को देखता रहा। ईंट की चार दीवारी थी। वैसे यह उस घर का पीछे का भाग मालूम पड़ता था। दरवाजे का रंग वही था जो महिला ने बताया था।
एक कमरा पक्का था। बाकी हिस्सा टीन की थी। थोड़ी देर तक खड़ा रहने के बाद मैंने दरवाजा खटखटाने की सोची। मन में आया कि अगर फूआ का घर न हो तो? फिर यह सोचकर कि किसी का भी घर हो जो बाहर निकलेगा उसी से फूआ का पता पूछूँगा, मैं दरवाजा खटखटाने वाला ही था कि मुझे अपने फूआ की आवाज सुनाई पड़ी। फूआ की आवाज मैं भलीभाँति पहचानता था। अब तो पूरा विश्वास हो गया कि मकान यही है। मैंने खूब जोर से दरवाजा खटखटाया। फूआ किसी लड़की को किसी व्यंजन के बनाने की विधि समझा रही थीं। दरवाजा खटखटाने पर वह लड़की दरवाजा खोलने आयी।
मैंने फूफा का नाम पूछा। उस लड़की ने बताया कि यही मकान है। मैं अन्दर गया। फूआ दरवाजे की ओर ही देख रही थीं। मुझे देखते ही जैसे खुशी का ज्वालामुखी फूट पड़ा हो ऐसा लगा। फूआ कितनी खुश हुईं, मैं नहीं बता सकता। लग रहा था दुनिया के सबसे बड़े खजाने को पा गयी हैं। या फिर मैराथन दौड़ में विश्व चैम्पियन का खिताब पा गयी हैं। या फिर वे कोई लेखिका हैं जिनके उपन्यास पर पुरस्कार पर पुरस्कार मिल रहे हैं। सारी दुनिया में उसकी चर्चा है। वैसे इन सभी परिस्थितियों में कोई व्यक्ति जितना खुश होता है उससे अधिक खुश थीं वो।
मेरे पैर छूते ही आशीर्वादों की झाड़ी लगा दी उन्होंने “अरे खूब खुश रहो। खूब पढ़ो। डाक्टर बनो। इन्जीनीयर बनो। शादी हो—।” इतना आशीर्वाद दिया मुझे कि मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता। लगभग पाँच मिनट तो आशीर्वाद ही देती रह गयीं। फूआ बी.ए. पास हैं। बुद्धिमान हैं। पर इतनी खुश हुई कि डाक्टर और इन्जीनीयर साथ-साथ बना दिया।
फूफा वहीं आँगन में नल पर नहा रहे थे। मैंने उन्हें प्रणाम किया और फिर फूआ के साथ कमरे में चला गया। वहाँ लकड़ी की कुर्सी पर बैठते हुए डर लगा कि कहीं पैंट गन्दा न हो जाय। पर बैठा मरता क्या न करता।
मैंने फूआ से चिंटू और पिंकी के बारे में पूछा फूआ ने बताया कि वे स्कूल गये हैं। उस लड़की ने सम्भवतः मेरे आने की खबर उन दोनों को दे दी। थोड़ी देर बाद वे दोनों दौड़ते हुए आए। मेरे पैर छुए। चिंटू बड़ा हो गया था। काफी दिन बाद दिखा था। मैं ठीक से पहचान नहीं पाया। फिर पिंकी ने प्रणाम किया। उसे भी बड़ी कठिनाई से पहचान पाया। एक विचित्र दृष्टि से मैं दोनों को देख रहा।
“ओले, भैया तो इतने शहरी हो गए कि हमें पहचान भी नहीं पाते।” पिंकी ने कहा और सब हँसने लगे। मैं भी हँसने लगा। इस तरह हँसने के लिए मैं तरसता था। एक प्राकृतिक हँसी पूरे वातावरण में गूँजने लगी।
गली में जब से उतरा था तब से सुखद अनुभूति का यह पहला क्षण था। पिंकी ने पानी दिया पीने को। एक प्लेट में जो काफी पुरानी और घिसी लगती थी पर साफ थी, कुछ सस्ते बिस्कुट और गिलास में पानी लेकर पिंकी मेरे बगल में रखी चौकी पर बैठ गयी। चिंटू एक काठ की कुर्सी पर मेरे बगल में बैठ गया।
सस्ते बिस्कुट मैंने अपने घर में कुत्ते टोमी को खिलाया करता था वैसे बिस्कुट खाना मुझे एकदम पसन्द नहीं था। पर वही बिस्कुट सामने रखे थे और मुझे उन्हें खाना था। बड़ी मुश्किल से एक बिस्कुट उठाया मैंने। खाकर पानी पीने ही वाला था कि पिंकी ने प्लेट उठा ली और मेरे आगे बढ़ा दिया। “भैया एक और” हँसते हुए, अंगुली दिखाते हुए मुझसे आग्रह किया। मेरा मन उस बिस्कुट को छूना का भी नहीं हो रहा था। पर अब चिंटू भी आग्रह करने लगा “भैया एक मेरी ओर से।”
“अरे भाई बहुत हैं—” मैंने पीछा छुड़ाने की सोची पर वे दोनों एकदम चिपक गए थे। “एक मेरी ओर से” यही रट लगाए रखी थी दोनों ने। आखिर एक बिस्कुट और खाना पड़ा। पर आश्चर्य! इसका स्वाद एकदम बदल गया था। पहला बिस्कुट खाते वक्त यही सोच रहा था कि कैसे गंदे दरिद्र के घर आ गया हूँ। एकदम सड़ियल बिस्कुट हैं। पर इस बिस्कुट के स्वाद को देखकर महान आश्चर्य हुआ। सोच रहा था कि अचानक इस बिस्कुट में क्या हो गया।
चिंटू के आग्रह पर एक और खाया। अब तो इच्छा हो रही थी कि किसी के बिना कहे चौथा भी खा लूँ। तब तक फूआ बोल उठीं “अच्छा बचा हुआ मेरी ओर से खा ले।” मैंने उसे तुरंत खा लिया। पानी पीकर मैं आराम से रखने के लिए झुका तब कुर्सी के पटरे के बीच मेरा पैंट और चमड़ी फँस चुकी थी। कुर्सी हिली तो चमड़ी दब गयी और लगा किसी ने जोर से चमड़ी नोच लिया है। दर्द से मेरे मुँह से आह निकली पर मैंने उसे दबा लिया। केवल कुर्सी ही ऐसी नहीं थी। घर की लगभग हर वस्तु की यही स्थिति थी।
चूल्हे वाले खाना बनाने वाले सामान के पास ही एक काफी पुराना पीतल का स्टोव था। वह कितना पुराना था इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसमें अधिक हवा नहीं भरा जाता। फटने का डर था। उसकी टंकी का चद्दर एकदम घिस चुका था। किसी तरह भोजन बनता था।
“भैया आज तो रुकोगे न?” पिंकी ने पूछा।
“क्यों मुझे खदेड़ देना चाहती हो क्या?” मैंने कहा और सभी हँसने लगे। तभी फूफा आए। नहाने से काँप रहे थे। कपड़े पहनने लगे पिंकी कपड़े देने लगी। तब चिंटू ने कहा “आज उसका जन्मदिन है। इसीलिए कह रही है।”
“भाई रात को तो—” पर मेरा वाक्य अधूरा रह गया पिंटू बीच में ही बोल पड़ा “नहीं आज हम नहीं जाने देंगे” और उसने मेरी बाँह पकड़ ली। जैसे मैं अभी भागा जा रहा हूँ।
“अरे अभी क्या जल्दी है। रात को रुको। कल सवेरे दस बजे गाड़ी जाती है एक उसी से चले जाना।” फूफा ने कपड़े पहनते हुए कहा।
“अभी तो पहली बार आए हो—” फूआ ने कहा। तब तक पिंकी बीच में ही बोल पड़ी “भैया मेरे जन्मदिन पर जरूर रुको।”
जब मैं गली की मुसीबतों का सामना कर घर में प्रवेश किया था। तब यही सोच रहा था कि बस दो घण्टे रुक कर चल दूँगा। पर यहाँ अब छुट्टी नहीं मिलने वाली थी। सब ने मिलकर मुझे इस तरह बाँध दिया था कि इस बन्धन से मुक्त होना असम्भव लग रहा था।
हम लोग कुछ बाहर जाने लगे। टीन के छप्पर वाले बरामदे में आग की व्यवस्था थी। फूआ ने चाय पीने को कहा फूफा को वहीं भेजने के लिए कहकर चल दिए। चिंटू ने आग जलायी। हम लोग वहीं बैठकर हाथ सेकने लगे। बातें होने लगीं। फूफा हाल-चाल पूछने लगे।
तब तक अन्दर से फूआ की आवाज आयी। चिंटू गया। थोड़ी देर बाद चाय लेकर आया। हम चाय पीने लगे। बीच-बीच में एक घूँट लेने के बाद मैं इधर-उधर का दृश्यावलोकन कर लेता था। चारदीवारी के किनारे ही क्यारी में कुछ फूल थे। उसी में नल। पास ही में गाय के लिए भूसा रखने के लिए एक कोठरी।
अचानक मेरी आँखों का यूरेनियम कुछ मन्द गति के न्यूट्रानों से टकरा गया; जो उस लड़की की टिप कर बुझी देखती हुई तिरछी नजरों से आ रहे थे; इसी लड़की ने दरवाजा खोला था। और अब शायद फिर फूआ से कुछ सलाह लेने जा रही थी। आँखों में बिस्फोट हुआ। ऐसा कि पूरा शरीर ही हिल गया। एक नहीं, दो नहीं, तीन बार न्यूट्रान मेरी आँखों के यूरेनियम से टकराए और पूरे शरीर में हलचल उत्पन्न कर दिया। हम फिर बातें करने लगे।
थोड़ी देर बाद वह लड़की वापस आयी। और फूफा को फूआ बुला रही हैं कहकर चली गयी। दरवाजे से निकलते समय एक फिर न्यूट्रान टकराए और फिर विस्फोट हुआ।
मैं अपनी शहरी प्रेमिका के बारे में सोचने लगा जिससे मैं फोन पर घंटों बातें न करता; शहर के अच्छे होटलों में सप्ताह में चार दिन नाश्ता न करवाता; महीने में एक बार उसे अच्छा सा गिफ्ट न देता; उसके साथ पिक्चर देखता तो उसे तड़ से दूसरा फ्रेंड झटक लेता। इस तरह जैसे वो एक सजीव गुड़िया हो जो पैसा देकर खरीदी ले।
फूफा ने मुझे नाश्ते के लिए बुलाया। पिंकी और चिंटू भी आए। आज फूआ ने गाजर का हलवा बनाया था। पिंकी और चिंटू नाश्ता लेकर आग के पास ही चले गए। बेचारे दोनों को भयंकर ठण्ड लग रही थी। शरीर पर कपड़े इतने अधिक न थे कि मेरी तरह आराम से रह सकें। आग ही सहारा थी। मैंने और फूफा ने कमरे में ही नाश्ता किया। फिर फूफा दुकान पर चले गए। चौक में रेडीमेड कपड़ों की एक दुकान थी। उसी पर पूरे घर की अर्थव्यवस्था टिकी थी। फूफा फिर दोपहर में आकर खाते थे। कोई फूफा के दुकान पहुँचाने वाला न था। क्योंकि चिंटू और पिंकी दोनों पढ़ने जाते थे।
मैं पिंकी और चिंटू के साथ फिर आग के पास बैठकर बातें करने लगा। दोनों को अपनी पढ़ाई के विषय में बातें करने की बड़ी उत्सुकता थी। पर अगर अपनी पढ़ाई के विषय में इतना ही सचेत रहता तो शायद हाईस्कूल में तीन साल न गिरता। धनी बाप का बिगड़ैल बेटा जो था! माँ अध्यापिका, किसी तरह पास हो गया था। फूआ ही पढ़ाती थीं उन दोनों को। दोनों पढ़ने में काफी अच्छे थे दोनों। दोनों के देश प्रेम को देखकर मैं बहुत ही शर्मिंदा कि भले ही एक अच्छे शहर के अच्छे मकान में रहता हूँ। सभी सुविधाएँ हैं। परन्तु देश पर बोझ ही हूँ।
चिंटू बड़े गर्व से कह रहा था “देखना मैं बड़ा होकर सेना में जाऊँगा। मेरे नाम के आगे लिखा जाएगा ‘एयर मार्शल’।” और पिंकी भला क्यों दबे? वो भी दो कदम आगे ही रहती।
हमारी बातों का सिलसिला तो तब टूटा जब फूआ ने हमें खाने के लिए बुलाया। हाथ पैर धोकर हम लोग चौके पर बैठे। मुझे बड़ा ही मूर्खता पूर्ण कार्य लगा। इतनी ठण्ड और उस पर से हाथ पैर धोना जरूरी; जूता निकालना जरूरी।
मैं पीढ़े पर बैठा। मेरे सामने एक थाली में मोटे किस्म का सस्ता चावल, पीली दाल, पत्ते वाली पकौड़ी, अचार आलू की सब्जी, चटनी आ गयी। मेरा मन तो उस मोटे चावल को देखकर खाना न खाने को कर रहा था। पर क्या करता खाना ही पड़ा। फूआ ने हँसते-हँसते कह दिया-क्या करें बाबू यही है यही खाओ। मैं कुछ न बोला। पर मन ही मन बड़ा गुस्सा आया कम से कम जो एक दिन के लिए आया है उसको बढ़िया खाना तो देना चाहिए। मान लिया कि घर फर्नीचर वगैरह बढ़िया नहीं है। कम से कम खाना तो बढ़िया देते। अच्छा होता मैं यहाँ आया ही न होता। बेकार ही आ गया। लग रहा है जानवर खाना है।
पर मन की बात बाहर न लाया। मन में ही रहने दिया। पर जिस खाने के विषय में मेरे मन में ये विचार आए थे। वही खाना मैंने ठक-ठक कर खाया। खुद मुझे आश्चर्य हो रहा था। लगा कहीं फूआ जादू-टोना तो नहीं जानतीं। बिस्कुट में भी यही हालत थी।
रविवार था। फूआ दोपहर में हम सब को लेकर आँगन में एक टूटी खाट पर बैठ गयीं। यह मुझे और भी अटपटा लगा। मैंने अनिच्छा जतायी। चिंटू तुरंत कुर्सी लाया। मैं उस पर बैठा। लगा अपनी अमीरी का बखान करने। लगा जैसा दुनिया का सबसे बड़ा आदमी हूँ मैं। जब भी कोई बात भिड़ती मैं अपनी अमीरी का बखान करने लगता।
इसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि वह लड़की भी वहीं थी। मैं उस पर अपनी अमीरी का प्रभाव डालना चाहता था। बातें होती रहीं। बीच-बीच में मेरी नजरें उससे टकरा जातीं पर कोई विस्फोट नहीं होता। इसकी नजरों में एक अनजान निर्भीकता आ गयी थी। मेरे व्यवहार से।
फूफा दोपहर में आए और खाना खा कर चले गए। उनकी साइकिल की हालत ये थी कि कोई थोड़ा मोटा आदमी बैठ जाय तो अंग-भंग ही जाय। और जिस खाट पर फूआ पिंकी और इस लड़की के साथ बैठी थीं; उसकी हालत में थी कि मेरे सामने ही कई रस्सी तो खटाक-खटाक टूटे।
शाम को फूफा आए उनके हाथ में दो-तीन पैकेट थे। शायद दो पैकेट में मिठाई थी पर तीसरे में क्या था मैं नहीं जान सका। जन्म दिन मनाने का तरीका भी विचित्र ही था। शाम को पिंकी ने नये कपड़े पहने और नौ दिए जलाए। भगवान की मूर्तियों के सामने रखकर पूजन किया गया। फिर मिठाई लेकर पिंकी सबके घर बाँटने और सबका आशीर्वाद लेने गयी। न तो कोई पार्टी न कोई भीड़-भाड़। बस नौ दिये जला दिए और हो गया जन्मदिन का कार्यक्रम सम्पन्न। फूफा ने उपहार स्वरूप एक पैकेट दिया। चिंटू ने एक कलम दिया। बाकी किसी ने कोई उपहार नहीं दिया। मैंने सोचा दरिद्र होंगे सब।
मैंने सौरुपए पिंकी को दिया। बड़ी मुश्किल से ले रही थी। लेना नहीं चाहती थी। पिंकी ने फूफा का दिया हुआ पैकेट खोला। खूब खुश हुई। उसमें एक प्रेरक प्रसंगों की पुस्तक थी। वह पुस्तक कोई बीस या पच्चीस रुपए की थी। यह उसके आगे मुझे अपने सौ रुपए तुच्छ लगे।
रात में दस बजे तक जाग कर वह किताब पिंकी पढ़ती रही।
मुझे सोने में भी काफी कठिनाई हुई क्योंकि ऐसी खाट पर सोने की आदत न थी। पर ऐसे बिस्तर पर जिसमें ‘टोना’ कर दिया गया हो सोना अत्यन्त सुखद था। रात भर मीठी नींद सोया। सोने के समय सोच रहा था: काश! बड़े शहरों में रहने वाले भी ये जादू टोना सीख जाते। इच्छा हो रही थी कि अपना यह कोट कबाड़ा उतार कर फेंक देता। इसी के कारण पिंकी और चिंटू भी मेरे पास आने से हिचकते थे। उन्हें शायद डर था कहीं मैं गुस्सा न हो जाऊँ। आश्चर्य था, अपना कोट उतारने के बाद मैं रात भर मीठी नींद सोया।
सुबह हुई और अभी कुहरा ही था कि मैंने जाने की इच्छा व्यक्त की। सबने मिलकर फिर रोक लिया। आखिर में दस बजे वाली गाड़ी पकड़ने का मैंने निश्चय किया।
जब चलने को हुआ तो फूआ ने कुछ रुपए मेरी जेब में ढूँस दिए। होली आने वाली थी सो पहले दे दिए। गली के मोड़ तक फूआ खुद छोड़ने आयीं। गली पार करते समय मुझे किसी प्रकार की बदबू का अनुभव नहीं हुआ। मैं यही सोच रहा था कि राखी बँधवाने जरूर आऊँगा। पिंकी से अच्छी बहन कहाँ मिलेगी? इतना स्नेह करने वाली बहन। अचानक मेरा ध्यान रुपए की ओर गया। पूरे सौ थे। उनमें अभिमान की गंध आ रही थी। वे मेरे दिए नोट थे। मैंने उन्हें रख लिया सोचा राखी बँधवाने आऊँगा तो अच्छी किताबों का एक सेट पिंकी को दूँगा।
मैं चलता-चलता गली के अन्तिम मोड़ पर आया। मैंने अपना रुमाल निकाला वही सुगन्धित रुमाल। मैंने इधर उधर देखा। कहीं कोई देख तो नहीं रहा। फिर धीरे से रुमाल आँख तक ले गया और अपने आँसू पोंछ लिए फूआ का जादू-टोना अब समझ में आ रहा था।












